नवम्बर की गुलाबी ठण्ड और एक “प्यार भरी कविता,अनंत की ओर” क्योंकि प्यार अगर होता है तो निरंतर चलता रहता ,समझाने पर भी रुकता नहीं। उसकी अपनी एक अलग दुनिया होती है शब्दों का बाजार होता है ख्यालों के बादल होते है आँखों में समंदर तैरता है न जाने किना कुछ है कहने को पर बोल नहीं पता है अपनी ख़ामोशी से शोर मचता है लौटआता है अपने वर्त्तमान में परअतीत उसके पीछे पीछे चलता परछाई की तरह जिससे वो कभी अलग नहीं हो पाता । …

कदमों को थाम तो लेते है
पर मन चल पड़ता है
तुम्हारे पीछे पीछे
बुलाने से भी नहीं आता
ज़िद कर बैठा है
तुम्हे मनाने की
ये कल्पना नहीं
हकीकत है एक कविता की

दूर तक जा कर
शब्दों को बटोरता है
भरता है अपने मन में
हाथों को तो थाम लेता है
पर कलम चल पड़ती है
धीरे धीरे

तुम्हीं से लगानी है
कागज़ के टुकड़े पर
एक संसार बनाता है
समंदर से गहरा
अपना प्यार बनता है
ख्यालों में डूब जाता है
मोती ढूंढ के लाता है
फिर एक कविता बनाता है
रोक लेता है ख़ुद को
तेरी चौखट पर
पर दिल अब भी
दरवाज़ा खटखटाता है
कोई आवाज़ नहीं आती
चारों तरफ सन्नाटा है
बस धड़कनों का शोर है
थमे थमे से कदम
और दौड़ती आशा
क्या यही है
प्यार की परिभाषा
एक कागज़ का टुकड़ा
सब कुछ सहता रहा
में तो थम गया
पर मन चलता रहा
तुम्हारे पीछे पीछे
एक अनंत अंत की ओर …..
